तुमसे कहा था ना
मुझे पयार न करना
मेरे रंग में न रंगना
मैं एक खवाब हूँ
अँघेरों में सजता हूँ
तनहाई मेरी सहेली है
तू गुम हो जाएगा
मंजिल से बिछड् जाएगा
पर तू न माना
हो गया न
तुझको मुझसे पयार,
मुझे भी समां लिया
अपनी आगोश में,
तारों के हिंडोले पर मैं
झूलने लगी,
तनहाईयाँ मेरी खुशियों
के रंग भरने लगी,
आजा सजायें हम
नया आशियाँ,
जहाँ मैं हूँ और
बस तुम ही तुम हो।
Saturday, 12 October 2013
तुमसे कहा था ना़
Monday, 30 September 2013
"तुम मेर्रे हो"
मेरे सपनो की भाषा
मेरे मन की परिभाषा
ए जान, तुमहारे लिए है
तुम मेरे हो......
मेरी रुह को जो रुमानी कर दे
वो अदा है तुम में
मेरे साये को भी पिघला दे
वो कशिश है तुम में
मेरी धड़कन की पुकार
ए जान, तुमहारे लिए है
तुम मेरे हो.......
मेरी नसनस को झनझना दे
वो छुअन है तेरी
मेरे बदन को जो महका दे
वो साँसें है तेरी
मेरे तन की आग
ए जान, तुमहारे लिए है
तुम मेरे हो........।।
Thursday, 26 September 2013
एक सपना
मैंने संजोया एक सपना
अपने हरदय विशाल में
एक अकुलाहट होती है
मेरे मन के आॅगन में,
तुम आ जाओ पी्त बनकर
मेरे इंदरधनुषी आँचल में,
क्षितिज हो जाए सारा मेरा
मेरे खवाबों के जहाँ में,
धैरय की तूलिका से लिखूँ
अपने सपनों का संसार मैं,
ऐसा परभात आ जाए जीवन में
करूँ बीते पलों को साकार मैं ।
Friday, 20 September 2013
SHAKTI DO BHAGWAN.
मेरी चेतना में तुम छाए रहते हो
मेरा आधार बन मुझे भक्ति देते हो
दूर करो मेरे ज्ञान के अवरोध तुम
दो मुझे एक नया दिशाबोध तुम
मिटाओ मेरा धूमिल भ्रम तुम
दे दो शीत सी धूप तुम
निज आनंद से दमकती मै
हो जाऊ बस विलीन तुम में
ऐसा एक वरदान दो तुम
तुम्हारे सजल नेत्रों में बसा
ये सारा संसार है
शक्ति दो भगवन मुझको
मुझमे बसे
कुछ क्षण ही अब प्राण हैं !!
मेरा आधार बन मुझे भक्ति देते हो
दूर करो मेरे ज्ञान के अवरोध तुम
दो मुझे एक नया दिशाबोध तुम
मिटाओ मेरा धूमिल भ्रम तुम
दे दो शीत सी धूप तुम
निज आनंद से दमकती मै
हो जाऊ बस विलीन तुम में
ऐसा एक वरदान दो तुम
तुम्हारे सजल नेत्रों में बसा
ये सारा संसार है
शक्ति दो भगवन मुझको
मुझमे बसे
कुछ क्षण ही अब प्राण हैं !!
PRITAM MORE
दिन भी अब श्यामल हो चला है
कब आओगे प्रीतम मोरे
प्रीत में तेरी रची बसी मै
मौन कैसे रह पाऊँगी,
राधा समान हरदम मै
प्रेम रस ही गाऊँगी,
हताश स्वरों में मेरे आजा
नये नये राग समो जा,
तेरे गुण गान हमेशा
करत करत रैन पसारूंगी,
जीवन प्यासा है मोरा
पानी से इसको तर जा,
श्याम वर्ण ओ प्रीतम मोरे
रास-रंग अब रचा जा,
अंजुली भर पानी लेकर
तुझ संग प्रीत बिसारुंगी,
हिरदय की दीवारों को मेरी
अब प्रेम मन्त्र सिखा जा !!!
दिन भी अब श्यामल हो चला है!
TUJH PAR LIKHU KAVITA...
अपनी सोच को किन
शब्दों मे ढालूँ ए दोस्त,और
तुझ पर लिखूं कविता !
आकाश की ऊँचाइयों में तू
दिल की गहराइयों में तू
तेरे वजूद को किन
शब्दों में ढालूँ ए दोस्त,और
तुझ पर लिखू कविता !
भगवान् का दिया उपहार तू
मेरे जीवन का सार तू
जो लम्हे साथ मिलकर बिताये
उन्हें किन
शब्दों में ढालूँ ए दोस्त,और
तुझ पर लिखू कविता !
तू है तो ये जिन्दगी है
तुम बिन "डिम्पी "अधूरी है
तेरे अहसास को किन
शब्दों में ढालूँ ए दोस्त,और
तुझ पर लिखूं कविता !!!
शब्दों मे ढालूँ ए दोस्त,और
तुझ पर लिखूं कविता !
आकाश की ऊँचाइयों में तू
दिल की गहराइयों में तू
तेरे वजूद को किन
शब्दों में ढालूँ ए दोस्त,और
तुझ पर लिखू कविता !
भगवान् का दिया उपहार तू
मेरे जीवन का सार तू
जो लम्हे साथ मिलकर बिताये
उन्हें किन
शब्दों में ढालूँ ए दोस्त,और
तुझ पर लिखू कविता !
तू है तो ये जिन्दगी है
तुम बिन "डिम्पी "अधूरी है
तेरे अहसास को किन
शब्दों में ढालूँ ए दोस्त,और
तुझ पर लिखूं कविता !!!
Wednesday, 18 September 2013
MAINE NA MANGI THI....
मैंने न मांगी थी सारे जहाँ की दौलत
सिर्फ तेरा साथ चाहा था,और
पल भर की मोहलत
देख कर एक भरपूर नज़र
कुर्बान जाती रब पर
सिर्फ तेरी मुस्कराहट थी,और
मेरे दिल की हुकूमत
न चाहा उम्र भर का साथ तेरा
सिर्फ तेरे रुखसार की लाली,और
तेरी इजहारे मोहब्बत
माना की हम न चल सकेंगे साथ तेरे
सिर्फ चाहेंगे तुझको,और
आह!भरेंगे दीदार की तेरे
मैंने न मांगी थी। … … !
Sunday, 15 September 2013
SUHANA MAUSAM.
महका हुआ फूल
बहकी हुई शराब
दूर से चंदा देख रहा है
नशा उसे भी परवान चढ़ा है
तारों की एकरसता देखो
टिम -टिम करते बहक रहे हैं
रोशनी अपनी बिखेर रहे हैं,
वो,देखो एक बादल आया
कोहरा उस पर घना है छाया
जैसे बादल हो नशे में चूर
कभी छुपता कभी निकलता
मद मे वो भी है मजबूर,
हवा भी कैसी है मस्तानी
लहर -लहर के चलती है
साये से अपने सबको मदमाती
झूमती झुमाती खूब चहकती
बिखर रही है सायं -सायं करती
नाच रही है छ्म -छम करती,
क्या हो गया इस प्रकर्ति को देखो
आकाश पाताल सब हुए एक हैं
बरखा बरसी घनघोर है
नाचे मन मेरा बन मोर है!!
बहकी हुई शराब
दूर से चंदा देख रहा है
नशा उसे भी परवान चढ़ा है
तारों की एकरसता देखो
टिम -टिम करते बहक रहे हैं
रोशनी अपनी बिखेर रहे हैं,
वो,देखो एक बादल आया
कोहरा उस पर घना है छाया
जैसे बादल हो नशे में चूर
कभी छुपता कभी निकलता
मद मे वो भी है मजबूर,
हवा भी कैसी है मस्तानी
लहर -लहर के चलती है
साये से अपने सबको मदमाती
झूमती झुमाती खूब चहकती
बिखर रही है सायं -सायं करती
नाच रही है छ्म -छम करती,
क्या हो गया इस प्रकर्ति को देखो
आकाश पाताल सब हुए एक हैं
बरखा बरसी घनघोर है
नाचे मन मेरा बन मोर है!!
GUJARISH
मेरी हर बात को
तुम समझ लेना,
मेरी इकरार की भाषा
तुम जान लेना,
मन में उमड़ती लहरों को
तुम समेट लेना,
मेरे अधरों की प्यास
तुम बुझा देना,
मेरे गीतों का राज़ जान
तुम गुनगुनाते रहना,
मेरे नैनों की भाषा
तुम पढ़ते रहना,
बस एक गुजारिश है तुमसे
जब भी मै रुठुं तुमसे
बस तुम मना लेना,
मेरी हर बात को
तुम समझ लेना !!
IN SOYE ARMANO KO .......
इन सोये अरमानो को
एक गीत से सजा दो,
बैठी हूँ बड़ी फुर्सत निकाल
एक गजल तो गुनगुना दो,
नही है मेरा हमकदम कोई
तुम नज़र भर मुस्कुरा दो,
न आये मुझे दिन को चैन
रात को मेरी तुम महका दो,
खवाबो को मेरे पूरा करके
एक हंसीं जिन्दगी जिला दो,
मेरे मन-आंगन में बसकर
मुझ संग एक बार खिलखिला दो,
जिंदा हूँ बस तुम्हारे ही दम पर
मन में मेरी तस्वीर आज तुम बना लो,
हूँ मै "पूनम "अमावस की
चंदा सी चाँदनी आज तुम बरसा दो,
इन सोए अरमानों को
एक गीत से सजा दो !!
एक गीत से सजा दो,
बैठी हूँ बड़ी फुर्सत निकाल
एक गजल तो गुनगुना दो,
नही है मेरा हमकदम कोई
तुम नज़र भर मुस्कुरा दो,
न आये मुझे दिन को चैन
रात को मेरी तुम महका दो,
खवाबो को मेरे पूरा करके
एक हंसीं जिन्दगी जिला दो,
मेरे मन-आंगन में बसकर
मुझ संग एक बार खिलखिला दो,
जिंदा हूँ बस तुम्हारे ही दम पर
मन में मेरी तस्वीर आज तुम बना लो,
हूँ मै "पूनम "अमावस की
चंदा सी चाँदनी आज तुम बरसा दो,
इन सोए अरमानों को
एक गीत से सजा दो !!
JB BHI NAYAN SAJAL HOTE HAIN....
जब भी नयन सजल होते हैं
तुम सामने आ जाते हो
मेरी श्रद्धा बन कर तुम
भक्ति रस जगा जाते हो
आस्था की एक लकीर
विश्वास मेरा जीत लेती है
मेरे माथे का चन्दन बन
एक अमिट छाप
छोड़ चले जाते हो
मै ढूढती हूँ
स्वप्निल आकाश में
एक ध्रुवतारा
जो आकाश-गंगा की परछाईयो
में शुन्य बन मेरी साधना को
भक्ति में समाविष्ट कर जाता है,
और
मैं एक भिक्षुक की भांति
इन्ही सजल नेत्रों से
ढूढती ही रह जाती हूँ
सिर्फ तुमको ! !
तुम सामने आ जाते हो
मेरी श्रद्धा बन कर तुम
भक्ति रस जगा जाते हो
आस्था की एक लकीर
विश्वास मेरा जीत लेती है
मेरे माथे का चन्दन बन
एक अमिट छाप
छोड़ चले जाते हो
मै ढूढती हूँ
स्वप्निल आकाश में
एक ध्रुवतारा
जो आकाश-गंगा की परछाईयो
में शुन्य बन मेरी साधना को
भक्ति में समाविष्ट कर जाता है,
और
मैं एक भिक्षुक की भांति
इन्ही सजल नेत्रों से
ढूढती ही रह जाती हूँ
सिर्फ तुमको ! !
Saturday, 14 September 2013
HAMARI BATTEIN
Hr roz unse battein hoti hain
Batton mai battein hoti hain
Kuch unse sunte hain
Kuch apni khete hain
Fir bhi adhuri rh jati hain
Bheeg jatein hain
Hum dono hi
Na jane kitni barsatein hoti hain
Kash,ye brkha aise hi barse
Na wo bhigein,
Na mai bhigun
Bas fuhare barsti rahein
Ek duje se battein karte
Hum dono yu hi chlte rahe!
NADI- EK GHARAYI
जब मैने उसे देखा
निर्मल निश्छल पवित्र सी
शांत भाव से बह रही थी
जो सूरज की तपन से
दमकने लगती थी ,
चाँद की रोशनी में
चमकने लगती थी ,
फिर कहाँ से एक पत्थर आया
उसकी धारा को हिला गया ,
झकझोर दिया उसे
अंतर्मन को हिला दिया
उसके निर्मल तन को
कितने ही बुलबुलों ने उसकी
काया पर दाग लगा दिए,
अन्दर का मैल भी सारा
सतेह पर आने लगा,
कछुए की मानिंद वो
अपने को छुपाने लगी,
दूसरा पत्थर न आये राह में
डरते-डरते फिरसे वह
अपने को समेटने लगी,
वही नियति फिर छाने लगी
निश्छल भाव लिए वो
फिरसे बहने लगी!
निर्मल निश्छल पवित्र सी
शांत भाव से बह रही थी
जो सूरज की तपन से
दमकने लगती थी ,
चाँद की रोशनी में
चमकने लगती थी ,
फिर कहाँ से एक पत्थर आया
उसकी धारा को हिला गया ,
झकझोर दिया उसे
अंतर्मन को हिला दिया
उसके निर्मल तन को
कितने ही बुलबुलों ने उसकी
काया पर दाग लगा दिए,
अन्दर का मैल भी सारा
सतेह पर आने लगा,
कछुए की मानिंद वो
अपने को छुपाने लगी,
दूसरा पत्थर न आये राह में
डरते-डरते फिरसे वह
अपने को समेटने लगी,
वही नियति फिर छाने लगी
निश्छल भाव लिए वो
फिरसे बहने लगी!
AHNKAR
अहंकार !
एक मानी हुई कला है
पुरुष इसको अपनी
बपौती समझता है
नारी पर इसी वज्र से
साम्राज्य करता है
गुलाम है इसका
प्रजा पर राज्य करता है
एक तुछ अस्तित्व
एक तिरस्कार भरा शब्द
जो जीने नही देता
जीने वालो को भी
मौत की दस्तक देता है
इसका आगाज बड़ा ही
दुखदायी होता है
पीड़ा देता है
जख्म भरने नही देता
ज्वाला समान धधकता है
शेर सा दहाड़ता है
इसका स्वामित्व पाकर
हर इंसान जड़ से उखड़ जाता है
फिर भी इसको अपनाकर
स्वयं को "स्वयं "से ही दूर ले जाता है
और यह अहंकार
"मै "और "तू"के बीच खड़ा रहता है !
एक मानी हुई कला है
पुरुष इसको अपनी
बपौती समझता है
नारी पर इसी वज्र से
साम्राज्य करता है
गुलाम है इसका
प्रजा पर राज्य करता है
एक तुछ अस्तित्व
एक तिरस्कार भरा शब्द
जो जीने नही देता
जीने वालो को भी
मौत की दस्तक देता है
इसका आगाज बड़ा ही
दुखदायी होता है
पीड़ा देता है
जख्म भरने नही देता
ज्वाला समान धधकता है
शेर सा दहाड़ता है
इसका स्वामित्व पाकर
हर इंसान जड़ से उखड़ जाता है
फिर भी इसको अपनाकर
स्वयं को "स्वयं "से ही दूर ले जाता है
और यह अहंकार
"मै "और "तू"के बीच खड़ा रहता है !
MAZBOOT BAN..
सूरज की सुनहरी किरणें
नये दिन का आगाज है
रुक नहीं आगे बड्र
तेरे दिल की आवाज़ है,
दुःख से जो तू थक गया
उजाला कहाँ से लायेगा
अँधेरा मिटाने जीवन का
संघर्ष कहाँ से लायेगा,
मजबूत बन ,धीरज धर
हाथ पकड उस पथ का
मंजिल पर जिसे पहुचना है,
काँटों की इस नगरी में
गुलाब हमें उगाना है
दहाड़ते शेर की पुकार से
डर कर न बैठ जाना है,
सयम को अपनी दीवार बनाकर
ये लडाई लड़ते जाना है
ख्वाबों को मेरे पूरा करने
खुदा को जमीं पर आना है,
आएगा वो सुनहरा दिन
रूह जिसके लिए रूमानी है
बेरहम इस वक़्त को
शिकस्त हमें दिलानी है
Friday, 13 September 2013
YAAD
हर रूप में तुमको चाहा
जब भी प्यार उमड़ा
सिर्फ तुमको ही पूजा
तुम जब भी याद आते हो
नित नये रंग में रंगते हो
जहाँ भी हो ,
जैसे भी हो,
तुम सिर्फ मेरे शेह्ज़ादे हो
जहाँ भी रहो,
जिस रूप में सजो,
तुम सिर्फ मेरे ही प्राण प्यारे हो
कई रूप तुमने बदले
रहे हरदम पास मेरे,
सिर्फ एक उपहार देना मुझको
मरते-मरते एक झलक अपनी ,
दिखा देना मुझको।
हर रूप में तुमको चाहा !
YAAD TUMHARI..
जब मै थी अकेली बैठी
तुम कहाँ चले गए थे ,
थक गयी ये अँखियाँ
इंतज़ार में तुम्हारे,
जकड लिया मेरा मन
प्यार ने तुम्हारे,
आँखें मुंद गई मेरी
कल्पना करते तुम्हारी,
कहकशां लगा रही थी
फिजाएं उदास देख सारी ,
उस क्षण कुछ ना था पास मेरे
स्मृतियों के सिवा तुम्हारी,
प्यासी जी रही थी मैं सिर्फ
एक आस लिए तुम्हारी,
जब मैं थी अकेली बैठी
तुम कहाँ चले गये थे?
तुम कहाँ चले गए थे ,
थक गयी ये अँखियाँ
इंतज़ार में तुम्हारे,
जकड लिया मेरा मन
प्यार ने तुम्हारे,
आँखें मुंद गई मेरी
कल्पना करते तुम्हारी,
कहकशां लगा रही थी
फिजाएं उदास देख सारी ,
उस क्षण कुछ ना था पास मेरे
स्मृतियों के सिवा तुम्हारी,
प्यासी जी रही थी मैं सिर्फ
एक आस लिए तुम्हारी,
जब मैं थी अकेली बैठी
तुम कहाँ चले गये थे?
TERI YAAD..
मेरे मन के एक कोने में
तेरी तस्वीर आज भी है
आरजू लिए जी रही हूँ
झलक को तेरी तरस रही हूँ
दिल कहता है ,तू आएगा
झलक अपनी दिखा कर चला जाएगा,
तू भी तो मुझे याद करता होगा
देखने को मुझे तरसता होगा
मेरी याद तेरे दिल में बाकी तो होगी ,
अगर सच्चा है मेरा प्य़ार !
तो खुदा को भी आयेगा रहम
एक दिन !
और उस दिन
मै तेरे सामने रहूंगी,
और तू मुझे देख रहा होगा।
तेरी तस्वीर आज भी है
आरजू लिए जी रही हूँ
झलक को तेरी तरस रही हूँ
दिल कहता है ,तू आएगा
झलक अपनी दिखा कर चला जाएगा,
तू भी तो मुझे याद करता होगा
देखने को मुझे तरसता होगा
मेरी याद तेरे दिल में बाकी तो होगी ,
अगर सच्चा है मेरा प्य़ार !
तो खुदा को भी आयेगा रहम
एक दिन !
और उस दिन
मै तेरे सामने रहूंगी,
और तू मुझे देख रहा होगा।
NARI - KYUN SEHTI HO ITNA?
नारी ,क्यों सहती हो इतना
क्यों इतनी कुंठित रहती हो
सब कुछ तुम्ही से बनता है
पुरुष भी तुम्ही जनमती हो
फिर क्यों सब सहती रहती हो,
हर पल प्रताड़ित होती हो
कर्त्तव्य -पथ पर चलकर भी
क्यों अपमानित होती हो
फिर क्यों सब सहती रहती हो ,
मानवता भी तुम्ही सिखाती हो
संस्कारों का बंधन बांधती हो
सभ्यता भी तुम्ही से रचती है
फिर क्यों सब सहती रहती हो ,
क्या है पुरुष की बाँहों में
जो तुम उस पर मरती हो
हर पल तुम्हे यातना देता है
फिर क्यों सब सहती रहती हो,
ए देव, पृथ्वी के रचयिता
क्यों तूने रचना की नारी की
सब पर ममता लुटाती हो
फिर क्यों सहती रहती हो,
नारी::,क्या यही तुम्हारी प्रक्रति है
यही तुम्हारी धारा है ?
सिर्फ बहना है ,
और बहते ही जाना है।
क्यों इतनी कुंठित रहती हो
सब कुछ तुम्ही से बनता है
पुरुष भी तुम्ही जनमती हो
फिर क्यों सब सहती रहती हो,
हर पल प्रताड़ित होती हो
कर्त्तव्य -पथ पर चलकर भी
क्यों अपमानित होती हो
फिर क्यों सब सहती रहती हो ,
मानवता भी तुम्ही सिखाती हो
संस्कारों का बंधन बांधती हो
सभ्यता भी तुम्ही से रचती है
फिर क्यों सब सहती रहती हो ,
क्या है पुरुष की बाँहों में
जो तुम उस पर मरती हो
हर पल तुम्हे यातना देता है
फिर क्यों सब सहती रहती हो,
ए देव, पृथ्वी के रचयिता
क्यों तूने रचना की नारी की
सब पर ममता लुटाती हो
फिर क्यों सहती रहती हो,
नारी::,क्या यही तुम्हारी प्रक्रति है
यही तुम्हारी धारा है ?
सिर्फ बहना है ,
और बहते ही जाना है।
SOCHEIN.. kitni gehri hoti hain
sochein, kitni gahri hoti hain
ek anant mahasagar ki tarah,
jiske tal ka nahi hai anuman,
anant, vishal ichhaao ko samete
vichran karti rehti hain,
har pal badalti rehti hain
ek anant mahasagar ki tarah,
jiske tal ka nahi hai anuman,
anant, vishal ichhaao ko samete
vichran karti rehti hain,
har pal badalti rehti hain
sochein, kitni gehri hoti hain,
ek pal yahan ek pal wahaan
bhagti hi rehti hain,
ek pal yahan ek pal wahaan
bhagti hi rehti hain,
nahi mila abhi tak koi thaur inhe
har kone mein simat jaati hain,
inke changul se bacha na koi
har insaan ko yeh sataati hain,
sochein, kitni gehri hoti hain,
maan manuhaar chhipa hai in mein
irshya krodh ki jagah bani hai,
tera-mera iske sangi-saathi
bhey-apmaan se grasit hain ye,
kyun insaan ko rulaati hain
kabhi khush kar jaati hain,
par fir bhi soch-sochkar hi
zindagi bitani padti hai
sochein, kitni gehri hoti hain!
DOSTI
dosti vishwas hai
pyar ka pyara roop hai
kudrat ki di hui
sabse bdi bakhshish hai
dosti ahssan nhi
ek khas cheez hoti hai
bade khushnaseeb hote hai
dosti jinhe naseeb hoti hai
udaas man ka theraav
hota hai dost ke hath mein
na mile dost jise
jindgi uski adhuri hoti hai
bhool jaye agar sab tumhe
dost hi saath nibhata hai
khud se khud hi ki phechaan
ek saccha dost hi karata hai..!
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