Saturday, 14 September 2013

AHNKAR

अहंकार !
एक मानी हुई कला है
पुरुष इसको अपनी
बपौती समझता है
नारी पर इसी वज्र से
साम्राज्य करता है
गुलाम है इसका
प्रजा पर राज्य करता है
एक तुछ अस्तित्व
एक तिरस्कार भरा शब्द
जो जीने नही देता
जीने वालो को भी
मौत की दस्तक देता है
इसका आगाज बड़ा ही
दुखदायी होता है
पीड़ा देता है
जख्म भरने नही देता
ज्वाला समान धधकता है
शेर सा दहाड़ता है
इसका स्वामित्व पाकर
हर इंसान जड़ से उखड़ जाता है
फिर भी इसको अपनाकर
स्वयं को "स्वयं "से ही दूर ले जाता है
और यह अहंकार
"मै "और "तू"के बीच खड़ा रहता है !

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