नारी ,क्यों सहती हो इतना
क्यों इतनी कुंठित रहती हो
सब कुछ तुम्ही से बनता है
पुरुष भी तुम्ही जनमती हो
फिर क्यों सब सहती रहती हो,
हर पल प्रताड़ित होती हो
कर्त्तव्य -पथ पर चलकर भी
क्यों अपमानित होती हो
फिर क्यों सब सहती रहती हो ,
मानवता भी तुम्ही सिखाती हो
संस्कारों का बंधन बांधती हो
सभ्यता भी तुम्ही से रचती है
फिर क्यों सब सहती रहती हो ,
क्या है पुरुष की बाँहों में
जो तुम उस पर मरती हो
हर पल तुम्हे यातना देता है
फिर क्यों सब सहती रहती हो,
ए देव, पृथ्वी के रचयिता
क्यों तूने रचना की नारी की
सब पर ममता लुटाती हो
फिर क्यों सहती रहती हो,
नारी::,क्या यही तुम्हारी प्रक्रति है
यही तुम्हारी धारा है ?
सिर्फ बहना है ,
और बहते ही जाना है।
क्यों इतनी कुंठित रहती हो
सब कुछ तुम्ही से बनता है
पुरुष भी तुम्ही जनमती हो
फिर क्यों सब सहती रहती हो,
हर पल प्रताड़ित होती हो
कर्त्तव्य -पथ पर चलकर भी
क्यों अपमानित होती हो
फिर क्यों सब सहती रहती हो ,
मानवता भी तुम्ही सिखाती हो
संस्कारों का बंधन बांधती हो
सभ्यता भी तुम्ही से रचती है
फिर क्यों सब सहती रहती हो ,
क्या है पुरुष की बाँहों में
जो तुम उस पर मरती हो
हर पल तुम्हे यातना देता है
फिर क्यों सब सहती रहती हो,
ए देव, पृथ्वी के रचयिता
क्यों तूने रचना की नारी की
सब पर ममता लुटाती हो
फिर क्यों सहती रहती हो,
नारी::,क्या यही तुम्हारी प्रक्रति है
यही तुम्हारी धारा है ?
सिर्फ बहना है ,
और बहते ही जाना है।
behtareen👍
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