Saturday, 14 September 2013

NADI- EK GHARAYI

जब मैने उसे देखा
निर्मल निश्छल पवित्र सी
शांत भाव से बह रही थी
जो सूरज की तपन से
दमकने लगती थी ,
चाँद की रोशनी में
चमकने लगती थी ,
फिर कहाँ से एक पत्थर आया
उसकी धारा को हिला गया ,
झकझोर दिया उसे
अंतर्मन को हिला दिया
उसके निर्मल तन को
कितने ही बुलबुलों ने उसकी
काया पर दाग लगा दिए,
अन्दर का मैल भी सारा
सतेह पर आने लगा,
कछुए की मानिंद वो
अपने को छुपाने लगी,
दूसरा पत्थर न आये राह में
डरते-डरते फिरसे वह
अपने को समेटने लगी,
वही नियति फिर छाने लगी
निश्छल भाव लिए वो
फिरसे बहने लगी!

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